नकटी अतिक्रमण: संवेदना अपनी जगह, लेकिन कानून भी तो सबके लिए बराबर होना चाहिए।
देवेंद्र किशोर गुप्ता की कलम से
रायपुर। नवा रायपुर के ग्राम नकटी में शासकीय भूमि से अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई ने पूरे प्रदेश में बहस छेड़ दी है। बुलडोजर चलते समय रोते-बिलखते परिवारों की तस्वीरें किसी भी संवेदनशील व्यक्ति को विचलित कर सकती हैं। वर्षों तक जिस घर में कोई परिवार रहा हो, उसका टूटना निश्चित रूप से पीड़ादायक होता है। लेकिन इस पूरे घटनाक्रम का दूसरा पक्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण है, जिसे समझना आवश्यक है।
जानकारी के अनुसार कार्रवाई अचानक नहीं हुई। लगभग दो वर्षों से संबंधित लोगों को लगातार नोटिस दिए जा रहे थे और भूमि खाली करने का अवसर भी दिया गया। इसके बावजूद बड़ी संख्या में लोगों ने शासकीय भूमि पर कब्जा बनाए रखा। प्रशासन द्वारा जारी सूची के अनुसार कई लोगों ने छोटे-मोटे नहीं बल्कि अत्यंत बड़े रकबे पर कब्जा किया हुआ था।
सूची के अनुसार देवकुमार पिता बिसहत रात्रे द्वारा 29,700 वर्गफुट, जानकी पति गणेश साहू द्वारा 29,600 वर्गफुट, मुकेश पिता मनहरण पाल द्वारा 19,800 वर्गफुट, माया राम पिता लैनू यादव द्वारा 18,500 वर्गफुट, दूरपति पति बिसहत रात्रे द्वारा 18,300 वर्गफुट, मनोज पिता अमरीका साहू द्वारा 17,200 वर्गफुट पर अतिक्रमण किया गया था। साथ ही राजू जोशी द्वारा 1,000 वर्गफुट, ईश्वर कुर्रे द्वारा 2,250 वर्गफुट, स्कुलू राम साहू द्वारा 15,600 वर्गफुट, परस साहू द्वारा 1,200 वर्गफुट, शत्रुघन साहू द्वारा 1,200 वर्गफुट, छन्नू पिता रामनारायण देवांगन द्वारा 2,800 वर्गफुट, लक्ष्मण साहू द्वारा 5,850 वर्गफुट, बसंत साहू द्वारा 1,200 वर्गफुट, घासी साहू द्वारा 10,000 वर्गफुट, राजलाल पिता भजन ढीढी द्वारा 14,400 वर्गफुट, पंचू साहू द्वारा 10,400 वर्गफुट, नेमीचंद पिता चैतू भारद्वाज द्वारा 800 वर्गफुट, अशोक पिता बुधुराम बंजारे द्वारा 3,800 वर्गफुट, भैयाराम पिता महेश रात्रे द्वारा 6,920 वर्गफुट, घसिया पिता इतवारी बघेल द्वारा 14,700 वर्गफुट, मुन्नी बाई जांगड़े द्वारा 800 वर्गफुट, कला बाई पति दाउलाल पाल द्वारा 12,500 वर्गफुट, सोने लाल पिता पईत लाल रात्रे द्वारा 11,200 वर्गफुट, भूरी पाल पति शंकर पाल द्वारा 14,600 वर्गफुट, देवाधीन पिता अभिनाथ द्वारा 750 वर्गफुट, सुकुल पिता गजराज साहू द्वारा 6,200 वर्गफुट, नंद कुमार पिता रामेश्वर कुर्रे द्वारा 11,400 वर्गफुट, बुगाला पति स्व. अजय डहरिया द्वारा 2,600 वर्गफुट, फेकन पति भैयाराम यादव द्वारा 7,600 वर्गफुट, प्रेमलाल पिता बोधीराम साहू द्वारा 800 वर्गफुट, भगवत पिता गजराज साहू द्वारा 6,400 वर्गफुट, पुनउ पिता बनवाली साहू एवं सीताराम पिता जगदीश साहू द्वारा 10,000-10,000 वर्गफुट तथा पुनउ पिता खेलावन साहू द्वारा 11,200 वर्गफुट, विष्णु पिता रामानुज साहू द्वारा 5,200 वर्गफुट, रमेश्वर पिता मिलउ साहू द्वारा 4,000 वर्गफुट, रामशीला पिता खेदउ द्वारा 8,100 वर्गफुट, सोनी यादव पति शिवकुमार यादव द्वारा 5,300 वर्गफुट, पुनउ पिता खिलावन द्वारा 5,200 वर्गफुट, तोषण यादव पिता चैतराम यादव द्वारा 2,000 वर्गफुट, चुरण पिता चैतराम यादव द्वारा 2,000 वर्गफुट, घनश्याम पिता सुखराम द्वारा 12,300 वर्गफुट, सेवाराम साहू द्वारा 11,400 वर्गफुट, शिवप्रसाद पिता कार्तिक साहू द्वारा 2,400 वर्गफुट, प्रमोद पिता संतराम साहू द्वारा 1,000 वर्गफुट, ओमप्रकाश पिता लखन यादव द्वारा 1,200 वर्गफुट, हुमेन्द्र पिता शिवकुमार यादव द्वारा 1,000 वर्गफुट, किसुन पिता ज्वाला यादव द्वारा 10,600 वर्गफुट, लीलाराम पिता रिखीराम साहू द्वारा 3,800 वर्गफुट, बिसाहू पिता डेरहा साहू द्वारा 4,200 वर्गफुट, लक्ष्मण पाल पिता बाहरू पाल द्वारा 1,800 वर्गफुट, फेरही पति महारू साहू द्वारा 8,500 वर्गफुट, चम्पालाल पिता तुलसीराम साहू द्वारा 2,200 वर्गफुट, सुधारू यादव द्वारा 3,400 वर्गफुट, गुलेची पति खेमू साहू द्वारा 2,000 वर्गफुट, मनवा पिता पन्ना लाल यादव द्वारा 2,800 वर्गफुट, धन्नू पिता पन्ना लाल यादव द्वारा 3,600 वर्गफुट, शत्रुहन यादव द्वारा 4,200 वर्गफुट तथा सुनीता पति अशोक बंजारे द्वारा 3,100 वर्गफुट शासकीय भूमि पर अतिक्रमण किया गया था।
इनमें से कुछ लोग जमीन जमीन निजी होने की बात कहते रहे परंतु शासन के वर्षों के रिकॉर्ड खंगालने के बाद उनके पूर्वजों का नाम उल्लेखित नहीं मिला।
साथ ही यहां जमीन का स्थानीय बाजार मूल्य लगभग ₹5,000 प्रति वर्गफुट बताया जाता है। तो इस एक ही 29,700 वर्गफुट कब्जेधारी भूमि का अनुमानित बाजार मूल्य लगभग ₹14.85 करोड़ बैठता है। अर्थात कई मामलों में करोड़ों रुपये मूल्य की सरकारी भूमि वर्षों तक निजी उपयोग में रही।
मेरे पड़ताल के अनुसार यह भूमि सामान्य आवासीय कॉलोनी की नहीं बल्कि शासकीय भाटा/चरागाह (गौचर) भूमि बताई जा रही है, जहां नियमानुसार स्कूल, अस्पताल, गौशाला जैसे सार्वजनिक उपयोग के निर्माण ही किए जा सकते हैं। भविष्य में उस भूमि का उपयोग किस उद्देश्य से किया जाएगा, यह सरकार का नीतिगत विषय है। यदि वहां विधायकों के आवास बनाए जाने का प्रस्ताव है तो उस पर अलग राजनीतिक बहस हो सकती है, लेकिन इससे शासकीय भूमि पर किए गए अतिक्रमण की वैधता सिद्ध नहीं हो जाती।
यहां एक महत्वपूर्ण तथ्य यह भी है कि प्रशासन के अनुसार हटाए गए परिवारों को सेक्टर-30, नवा रायपुर में आवास उपलब्ध कराए गए हैं। जिन फ्लैटों को सामान्य परिस्थितियों में हाउसिंग बोर्ड लगभग ₹8 लाख में बेचता है। वही फ्लैट प्रभावित परिवारों को मालिकाना अधिकार के साथ दिए जाने की प्रक्रिया चल रही है। जिन लोगों के प्रधानमंत्री आवास बने थे और कार्रवाई में प्रभावित हुए, उनके लिए ऐसी ही व्यवस्था है। परंतु यहां पर प्रशासन को उनके रोजगार, बच्चों को शिक्षा और स्वास्थ्य की चिंता भी करनी होगी। साथ ही उनके पशुधन के लिए व्यवस्था बनानी होगी।
इस पूरे मामले में सबसे बड़ा प्रश्न न्याय का भी है।
एक मध्यमवर्गीय परिवार रायपुर में 800 या 1000 वर्गफुट का छोटा-सा प्लॉट खरीदने के लिए जीवनभर की कमाई लगा देता है। 25 से 35 वर्ष तक बैंक की ईएमआई भरता है। टैक्स भी देता है, बिजली-पानी के बिल भी चुकाता है और हर नियम का पालन करता है। दूसरी ओर यदि कोई व्यक्ति हजारों या दसियों हजार वर्गफुट शासकीय भूमि पर वर्षों तक कब्जा कर ले, तो क्या केवल भावनात्मक आधार पर उस कब्जे को सही ठहराया जा सकता है?
इस मामले में यह भी चर्चाओं में रहा कि कुछ कब्जाधारियों ने उसी भूमि पर लाखों रुपये के मकान बना लिए। यहां तक कि यह भी बात सामने आई कि किसी ने जमीन बेचकर लगभग 50 लाख रुपये का मकान बनाया तथा कुछ लोगों के पास पर्याप्त पशुधन और आर्थिक संसाधन भी थे। यदि ऐसे दावे सत्य हैं, तो यह प्रश्न और गंभीर हो जाता है कि क्या सभी कब्जाधारियों को केवल गरीब मान लेना उचित होगा? निश्चित रूप से वहां दिहाड़ी मजदूर और वास्तविक जरूरतमंद परिवार भी थे, लेकिन उनके साथ आर्थिक रूप से सक्षम लोग भी शामिल थे। इसलिए पूरे मामले को केवल “गरीब बनाम सरकार” के रूप में देखना शायद पूरी तस्वीर नहीं है।
हालांकि इस कार्रवाई के साथ एक और महत्वपूर्ण सवाल भी उठता है। समाज में लंबे समय से यह धारणा रही है कि गरीबों के अतिक्रमण पर बुलडोजर जल्दी चलता है, जबकि प्रभावशाली और संपन्न लोगों द्वारा किए गए अतिक्रमण वर्षों तक बने रहते हैं। यदि सरकार वास्तव में कानून के राज की स्थापना करना चाहती है तो उसे इस धारणा को भी समाप्त करना होगा। कार्रवाई गरीब और अमीर देखकर नहीं बल्कि अवैध कब्जे की प्रकृति देखकर होनी चाहिए। जहां भी करोड़ों की सरकारी जमीन पर प्रभावशाली लोगों का कब्जा है, वहां भी समान कठोरता दिखाई जानी चाहिए। इस बात का जवाब मै ये समझ आया कि सामूहिक अतिक्रमण अधिक दिखाई देता है, जबकि बड़े लोगों के कब्जे अक्सर व्यक्तिगत होते हैं और सुर्खियों में कम आते हैं। लेकिन कानून की नजर में दोनों समान ही होता है। अमीर हो या गरीब, नेता हो या व्यापारी सरकारी जमीन पर अवैध कब्जा यदि गलत है तो कार्रवाई भी सब पर समान रूप से होनी चाहिए।
नकटी की घटना हमें केवल एक गांव की कहानी नहीं बताती, बल्कि यह सवाल भी पूछती है कि सार्वजनिक संपत्ति पर अधिकार किसका है? यदि सरकारी जमीन पर कब्जा सही मान लिया जाए, तो फिर वह व्यक्ति जो ईमानदारी से जमीन खरीदता है, टैक्स देता है और पूरी जिंदगी कर्ज चुकाता है, उसके साथ न्याय कैसे होगा?
संवेदना आवश्यक है। विस्थापित परिवारों के पुनर्वास की जिम्मेदारी भी शासन की है। लेकिन कानून का पालन भी उतना ही आवश्यक है। गलत को केवल इसलिए सही नहीं कहा जा सकता क्योंकि वह वर्षों से चलता आ रहा था।
राजनीति इस मुद्दे पर अपने-अपने तर्क देती रहेगी, लेकिन समाज को भी निष्पक्ष होकर सोचना होगा। सरकारी भूमि चाहे किसी गरीब ने घेरी हो या किसी अमीर ने यदि वह अवैध कब्जा है, तो उसे अवैध ही कहा जाना चाहिए। और यदि कार्रवाई हो, तो उसका पैमाना भी सबके लिए समान होना चाहिए।
यही न्याय का मूल सिद्धांत है।
